Skip to main content

Author: Yogacharya Dhakaram

Founder of YogaPeace Sansthan, Yogacharya Dhakaram is an internationally acclaimed yoga teacher and healer with over 30 years of experience. He has trained thousands of students in yoga and is known for his depth of knowledge and his ability to turn around lives with yoga.

बद्ध कोणासन

अर्थ-

इस आसन में शरीर की आकृति एक बंधे हुये कोण की होती है, अतः इसे बद्धकोणासन कहते है।

विधि-

दोनों पैर (मिले हुये) सामने फैलाकर सीधे होकर दण्डासन में बैठ जायें। श्वास छोडते हुये दोनों घुटने मोडकर दोनों पैरों की एड़ी, पंजे व तलुवे आपस में मिला दें। दोनो घुटनों व जांधों को पूरी तरह ढीला छोडते हुए जमीन की तरफ जाने दें एवं मिले हुये एडी, पंजो को ज्यादा से ज्यादा जननांगों के पास ले आयें। दोनों हाथों की सहायता से पैरों के मिले हुये पंजों को बांधकर पकड लें ताकि वो मिले रहें। कमर, पीठ, गर्दन को सीधा रखते हुये श्वास को सामान्य रखें। आंखें बन्द व मन को शान्त रखें, शुरूआत में 10 मिनिट तक का अभ्यास करें। विपरीत क्रम में वापस आयें।

लाभ-

  • यह बस्तिप्रदेश के अंगों को निर्दोष बनाकर उन्हें सुदृढ करता है।
  • बस्ति प्रदेश, उदर, एवं पीठ में रक्त संचार बढाता है।
  • घुटनों, कुल्हों व साईटिका के दर्द एवं हर्निया में लाभकारी
  • गुर्दा, शिश्न की ग्रंथियां एवं मुत्राशय को स्वस्थ बनाता है।
  • मुत्र रोगों को ठीक करता है।
  • अनियमित मासिक धर्म को ठीक करता है।
  • गर्भावस्था के दौरान यह अभ्यास करने से प्रसूति आसान व पीडारहित होने के साथ गर्भस्थ शिशु के लिये भी अत्यन्त लाभकारी है।

सावधानिया-

घुटनों व जांधों को ढीला छोडकर सहजता से जमीन से लगाये, कोई अतिरिक्त दवाब नहीं डालें। आवश्यकता होने पर कुल्हों के नीचे (आसन के रूप में) मोडा हुआ कम्बल/ईंट/मसन्द (4-5 इंच मोटा) लगा सकते है। इस आसन का अभ्यास भोजन के बाद भी किया जा सकता है।

नाड़ी षोधन ( अनुलोम विलोम)

इस प्रणायाम के अभ्यास से नाडियों का षुद्धिकरण होता हैं। अतः इसे नाड़ीषोधन कहते हैं।भस्त्रिका की तरह ही सीधे बैठकर, कोमलता से आँखें बंदकर, अंतर्मुखी हो जायें। ष्वासनिकालते हुये अपना दाहिना हाथ उठायें। ष्वास पूरी तरह निकालने के बाद दाहिने हाथ के अंगुठे कीे सहायता से दाहिना नासारंध्र बंद करें। बाॅये नासारंध्र से धीरे- धीरे ष्वास भरें। पूरी तरह ष्वास भरने के बाद अनामिका अंगुली की सहायता से बायीं नासिका (नासारंध्र) बंद करेंव दाँई नासिका से अंगुठा हटा लें। अब दाँई नासिका से ष्वास निकालें एवं पुनः भरें। वापस अंगुठे से दाहिना नासारंध्र बंद करें व बाँये नासारंध्र को खोलकर बाँये से ष्वास बाहर निकालें।

यह एक चक्र हो गया। इस प्रकार लगातार 5 से 10 चक्र करें। अन्तिम चक्र पूरा होने के बाद बाँई नासिका से ष्वास भरकर कम से कम 1 मि. तक विश्राम व आत्मनिरीक्षण करें। ष्वास सामान्य रखें। अगर नियमित अभ्यास कर रहे हों तो हर माह 3-4 चक्रों का अभ्यास बढा सकते हैं।

सावधानी (विषेष):

नासारंध्र बन्द करने हेतु अंगुठा व अनामिका अंगुली का दबाव नाक पर हल्का ही रखें। ष्वास भरने व निकालने की गति एक जैसी (इकसार) व इतनी धीमी रखें कि इसकी ध्वनि आपको भी न सुनाई दें। (गति के लिये व्यक्तिगत क्षमता का ध्यान रखकर कम ज्यादा कर सकते हैं।) आवष्यकता होने पर हाथ बदल सकते हैं। ष्वास निकालने (रेचक) में लगनेवाला समय, ष्वास भरने (पूरक) में लगने वाले समय, से ज्यादा हो तो अच्छा, बराबर भी हो सकता हैं, पर कम नहीं होना चाहिये। साथ ही हर बार पुरक का समय एक समान व रेचक का समय
भी एक समान रहना चाहिये। समय के माप के लिये मन ही मन गिनती गिन सकते हैं। हाथ की तर्जनी व मध्यका अंगुली मस्तक पर दोनों भौहों के बीच (टीका या बिन्दी लगाने के स्थान पर) रख कर, ध्यान भी वहीं केन्द्रित करें। प्राणायाम का लाभ प्रभुकृपा से कई गुणा बढ जायेगा। हठयोग में दाएं नथुने को पिंगला या सुर्य नाड़ी व बाँऐं नथुने को इड़ा या चंद्र नाड़ी कहा
गया हैं तदनुसार दायें नथुने से ष्वास भरना षरीर को उष्णता व बाँयें सेे ष्वास भरनाषीतलता प्रदान करता हैं। अतः जब षीतकाल में अभ्यास करें तो उपरोक्त अनुसार नहीं करके उक्त चक्रों की षुरुआत बायें नथुने से ष्वास भरने की जगह दांयें नथुने से ष्वासभरकर करें तो उत्तम हैं।

लाभ:

मतभिन्नता होते हुये भी ज्यादातर परंपराओं के मतानुसार छोटी-बड़ी कुल 72 हजार 800 नाडि़याँ होती हैं। उनमें से 10 नाडि़याँ प्रमुख होती हैं। इनमें भी इड़ा, पिंगला व सुषुम्ना ये तीन नाडि़याँ अतिमहत्वपूर्ण हैं, जो कि मस्तिष्क से लेकर मलद्वार के पास तक आती हैं। नाड़ी-षोधन के नियमित अभ्यास से इन तीनों का षुद्धिकरण होकर इनमें षक्ति का संचार होने से मन में षान्ति का संचार, विचारों में स्पष्टता व एकाग्रता आती हैं। षरीर में आॅक्सीजन की मात्रा बढती हैं, अतः पूरे षरीर में षक्ति का संचार होता हैं।प्राणिक अवरोधों को दूर कर इड़ा व पिंगला में संतुलन लाता हैं। जिससे सुषुम्ना नाड़ी का प्रवाह प्रारम्भ हो जाता हैं, परिणामस्वरुप गहन ध्यान की अवस्था और आध्यात्मिक जागरण की प्राप्ति होती हैं।

भस्त्रिका

लुहार की धौंकनी की तरह वेग पुर्वक वायु भरने व निकालने की समानता के कारण यह नामकरण है। पùासन, अर्धपùासन या सुखासन (पालथी) में बैठ जायें। कमर, पीठ, गर्दन सीधी रखें मगर इनमें कोई अकड़ ना हो। दोनों हाथ घुटनों पर सामान्य स्थिति में रखें। आँखें कोमलता से बन्द कर लें और अन्तर्मुखी हो जायें। वेगपूर्वक ष्वास लेते हुये दोनों हाथों को धीरे-धीरे सिर से ऊपर उठायें। पूरी तरह (अधिकतम) ष्वास भरने के बाद हाथों को नीचे लाते हुये वेगपुर्वक ष्वास बाहर निकाल दें। पूरा ष्वास निकालने के बाद दोहरायें और लगातार 15 से 20 चक्र करें। अन्तिम चक्र में ज्यादा से ज्यादा ष्वास निकालकर 1 मि. तक विश्राम व आत्मनिरीक्षण करें। यह (विश्राम) अत्यन्त महत्वपूर्ण व आवष्यक हैं।

विषेष: दोनों हाथों को ऊपर-नीचे करने के क्रम में षरीर में अनावष्यक अकड़, झटका या हलचल नहीं हो। चेहरा सामान्य व तनाव-मुक्त रहे। ष्वास भरने व निकालने का समय बराबर रहना चाहिये। ष्वास ज्यादा से ज्यादा भरें व पूरी तरह निकालें। अपना पुरा ध्यान ष्वासों पर केन्द्रित रखें।

सावधानी:जिन व्यक्तियों को उच्च रक्तचाप, हृदय-रोग, हर्निया, गैस्ट्रिक अल्सर, मिर्गी रोग या चक्कर आने की समस्या है वे यह अभ्यास नहीं करें।

किसी-किसी नये साधक को षुरुआती दिनों में सिर में भारीपन या चक्कर का एहसास हो तो कुछ समय विश्राम करें, और कुछ दिनों तक ष्वास भरने व निकालने की गति धीमी या सामान्य रखकर अभ्यास करने के बाद धीरे-धीरे ष्वास की गति बढायें। अभ्यास नियमित व दृढ होने के साथ ही क्रमषः चक्रों की संख्या बढाते हुये अभ्यास को तीन मिनट तक बढायें।

लाभ:षरीर से विषाक्त तत्वों को दूर करता है व वात, पित्त व कफ तीनों से सम्बन्धित रोगों को दूर करता हैं। षरीर का चयापचय;डमजंइवसपेउद्ध बढाता हैं व रक्त में आॅक्सीजन की मात्रा बढाता हैं। पाचन संस्थान व फुफ्फसों को पुष्ट करता है, दमा, फेफड़े के रोग, गले के रोग व कफ की समस्या में अत्यन्त लाभकारी है। ध्यान की तैयारी में हायक है।

सर्वागांसन

[cmsms_row][cmsms_column data_width=”1/1″][cmsms_text]

जैसा की नाम से ही स्पष्ट हैं षरीर के सारे अंगों को फायदा पहुँचाने वाला होने से ही इसका नाम सर्वागांसन हैं।

विधि:

सर्वप्रथम कम्बल या योगामैट पर पीठ के बल लेट जाएं, एड़ी और पंजों को मिला के रखें, हथेलियों का रूख जमीन की ओर रखते हुए षरीर से लगा कर रखें। ष्वास छोड़ते हुए दोनों घुटनों को मोडते हुए छाती पर रख दें। घुटनों को सीधा करते हुए पैरों को ऊपर उठा लंे एवं जमीन से एक 90व्म् का कोण बनाएं। हथेलियों का हल्का दबाव जमीन पर देते हुए धीर-धीरे नितम्ब कमर व पीठ को ऊपर उठाए और दोनों पैरो को भी और ऊपर तानते हुए सीधा करें। इस स्थिति में आपके कंधे से लेकर पैरों तक का भाग जमीन से लम्बवत हो जाएगा एवं षरीर का पुरा वजन आपके कंधांे पे आ जाएगा। कोहनियों से हाथों को मोड़ कर हथेलियों को कमर से लगा कर सहारा दें और पीठ को भी सीधा करने का प्रयास करें। इस स्थिति में आपकी ठुड्डी छाती से लग जाएगी। सीने को ज्यादा से ज्यादा चैड़ा करं,े ष्वास सामान्य रखें। इस स्थिति में 3-5 मिनट रूकें। विपरीत क्रम में धीरे- धीरे (बिना झटके के) वापस आएं और पीठ के बल सीधा लेट कर विश्राम करें।

सावधानी:

आसन की अन्तिम अवस्था में पहँुचने के बाद ध्यान रखें की गर्दन में किसी प्रकार का तनाव ना आए। सारा वजन कंधों व कोहनियों तक ही सीमित रखें। पैरों के पंजे सिर से आगे नहीं जाने चाहिए। जिनके गर्दन व पीठ में दर्द रहता है वो उपयुक्त गुरू की सलाह से ही करें।

लाभ:

  • अन्तःस्त्रावी ग्रंथियां सक्रिय होती हैं। अतः षरीर की हार्मोन की गड़बडियाँ ठीक होती हैं।
  • रक्त का सँचार विपरीत दिषा में होने से षरीर के सभी अंगों को फायदा मिलता हैं।
  • पुरूष व महिला दोनों के जननांगो से सम्बन्धित रोगों में विषेष लाभकारी है।
  • षरीर की कमजोरी को दूर कर, स्फुर्ति प्रदान करता हैं।
  • त्वचा रोगों में विषेष लाभकारी हैं। बच्चे के संपूर्ण षारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य का जिस प्रकार मां स्वास्थ्य का पोषण करती हैं, उसी प्रकार यह आसन संपूर्ण षरीर व मन को पोषित व व्यवस्थित रखता है। अतः सर्वांगासन को मां का दर्जा भी दिया जाता है।

[/cmsms_text][/cmsms_column][/cmsms_row]

कपाल भाति

अर्थ-

कपाल का अर्थ हैं ललाट और भाति का अर्थ हैं चमकना अथार्थ कपाल भाति ललाट को चमकदार वाला अभ्यास हैं !

विधि-

सिद्ध पदम या अन्य ध्यानात्मक आसान में सीधे बैठ जाइये! इसमें पद्मासन उपयोगी रहता हैं छाती आगे की और उभरी हुई तथा स्थिर रहती हैं! हथेलियों और हाथो को सामान्य स्थिति में रखे! उदर को संकुचित रखते हुए श्वास को झटके से बहार फेंकिए ! जैसे लोहार की धौकनी को दबाने से उसमे सिथित वायु वेग से बहार निकलती हैं उसी तरह की क्रिया ये करनी हैं इस विधि में श्वास का बहार निकलना सक्रिय तथा भीतर लेना निष्क्रिय हैं केवल अंदर खीचने और श्वास को बाहर निकालने का
अभ्यास करना हैं ! श्वास बितर स्वत ही आ जाएगी!

सावधानिया-

प्रारम्भ में एक मिनट में 50-60 धक्के की गति से अभ्यास करना चैहिये इस के बाद इसे 120 तक बढ़या जा सकता हैं ! नए विध्यार्थी को 20 धक्के का चक्र कर के विश्राम करना चाइए! अंतिम चक्र में फेफड़ो को पूरी तरह खाली कर के विश्राम एवं आत्म निरिक्षण करना मेह्तवपूर्ण एवं आवश्यक हैं !

सीमाये-

रक्त चाप,हृद्य रोग, हाइपर टेंशन, चक्क्कर आना, हर्निया, रक्तचाप, ग्रेस्टिक अल्सर से पीड़ित व्यक्तियों का इसका अभ्यास नई करना चाइए ! गर्भवती महिलाओं के लिए अभ्यास वर्जित हैं! जिन्हे कमर दर्द की शिकयत हो उन्हें कपाल भाति का अब्याश सावधानी पूर्वक व धीरे धीरे करना उचित हैं सम्मान्ये व्यक्ति को कपाल भाति को अब्यास 3 से 5 मिनट तक करना चाइए! प्रारभ में करने में परेशानी हो तो अपने सामर्थ्ये के अनुसार करना चाइए जसे जसे पेट की मांसपेशिया लचीली व मजबूत होती चली जाये वसे वसे समाये बढ़ा देना चाइए !
श्वास को वेगपूर्वक बाहर निकालने (मुख मुद्रा सामान्ये रखते हुए ) पर लगाये! चेहरा सामान्ये रखे किसी प्रकार क्क तनाव या खिचाव ना आने दे!

लाभ-

इस क्रिया के निरंतर अभ्यास से माथे व चेहरे पर अलग ही तेज दिखाई देने लगता हैं! शरीर की रोध प्रतिरोधक समता बढ़ने लगती हैं! वात कफः पित को संतुलित रखती हैं! इससे पेट के समस्त अवयवो को अछा खिचाव व मसाज मिलता हैं जिससे पेट के समस्त अवयव जसे यकृत प्लीहा, पाचन ग्रंथि इत्यादि अपना काम सुचारू रूप से करने लगते हैं जिससे उदार की
मांसपेशिया क्रियाशीएल एवं शक्तिशाली बनने लगती हैं! यह डायबिटीज़ के सभी रोगियों के लिए लाभकारी हैं! यह पेट की अनावश्यक चर्बी को काम करने में थोड़ा बोहत मदद करता हैं
शारीरिक व मानसिक शमता का विकास होकर व्यक्ति प्रसन्ता का अनुभव करता हैं!

प्राणायाम

प्राण यानि ष्वास को एक नया आयाम अर्थात रुप (या विस्तार) देने में पुर्णतः सक्षम होने की वजह से ही योग के अन्तर्गत की जाने वाली ष्वास की अनेक क्रियाओं को प्राणायाम कहते हैं। यथा- भस्त्रिका, कपालभाति, उज्जायी, नाड़ी-षोधन आदि। प्राणायाम की ये क्रियायें न केवल ष्वासों को नया विस्तार या जीवन देती हैं बल्कि विभिन्न हारमोनल ग्रंथियों पर भी इनका विस्मयकारी सुप्रभाव देखा जाता हैं। ये षरीर के विभिन्न रोगों को भी दूर करने में सक्षम हैं। इसके अलावा प्राणायामों के अभ्यास से ष्वास नियमित व दीर्घ हो जाता हैं। ष्वास जब भी
नियमित (लयबद्ध) और दीर्घ चलता है तो मन अपने आप ही षान्त हो जाता है। अतः प्राणायाम मन की उद्धिग्नता को कम कर षान्ति भी प्रदान करता हैं। प्राणायाम में ष्वास लेना या भरना (पूरक), भरने के बाद रोककर रखना (आभ्यन्तरीण कुम्भक)ष्वास निकालना (रेचक) निकालकर रोककर रखना (बाह्नय कुम्भक) ये चार क्रियाएँ की जाती हैं।

अतः हम इस पुस्तक में केवल पूरक (ष्वास लेना) और रेचक (ष्वास छोड़ना) क्रियाओं की ही चर्चा करेंगे।हमारी नजर में आसन का अभ्यास भले ही किसी कारणवष थोड़ा कम कर लिया जाये, मगर प्राणायामों का अभ्यास अवष्य नियमित करना चाहिये। यहाँ प्राणायाम प्रकरण में हम केवल तीन ही (कपालभाति, भस्त्रिका और नाड़ी षोधन) प्राणायामों के बारे में बता रहे हैं, क्योंकि ये तीनों मिलकर पेट, छाती, फेफड़े और मस्तिष्क को विषुद्ध, निरोग और षक्तिषाली बनाते हैं।

पाश्चिमोतानासन

अर्थ-

योग के संदर्भ में पूर्व यानि शरीर का सामने या पेट की तरफ का हिस्सा और पश्चिम यानि पीछे या पीठ की तरफ का भाग। उत्तान का अर्थ होता है तानना। चूॅकि इस आसन में शरीर का पृष्ठ (पश्चिम) भाग पूरा तनता है, अतः इसे पश्चिमोत्तान कहते है।

विधि-

दोनों पांवों को सामने फैलाकर सीधे बैठ जायें। एडी पंजेे मिलाकर रखे। दोनों कंधों को थोडा सा पीछे की ओर खींचे ताकि आपका सीना पूरी तरह फूल जाये। दोनों हाथों
को अधिकतम तानते हुये कन्धों की ऊंचाई तक लाकर, कन्धों के जोड से हाथ को धुमाकर, हथेलियों का रूख आसमान की तरफ कर दें। अब हाथों को पूरी तरह तानते हुये सिर से ऊपर ले जायें ताकि आपके कुल्हों से लेकर सिर और हाथों तक आपका शरीर एक सरल रेखा में, पूरी तरह खिंचाव की स्थिति में आ जायें। अब पेट को अन्दर खींचते हुये कुल्हों के जोड़ से मुडकर सामने झुकंे और पैरों के अंगूठों को पकडने का प्रयास करें। गर्दन सहज स्थिति में रखते हुए दृष्टि सामने की तरफ रखें। अब धीरे-धीरे छाती को जांधों से लगाने का प्रयास करें, ललाट को घुटनों से लगाने का प्रयास करें। एक से दो मिनट इस स्थिति में रूककर विपरीत क्रम में धीरे-धीरे वापस लौटे। प्रारम्भिक स्थिति में विश्राम करें।

लाभ-

यह उदर के अवयवों को शक्तिशाली बनाता है। यह अजीर्ण कब्ज तथा शुक्र दौर्बल्य को दूर करता है। इसका अभ्यास साईटिका होने की संभावनाओं को घटाता है। कमर एवं नितम्बों की मांसपेशियों को स्वस्थ करता है। यह आसन कटिप्रदेश के सभी अंगों पर दबाब डालता है व उन्हें रोग मुक्त करता है, इसलिए यह स्त्रियों की मासिक धर्म सम्बन्धी परेशानी व प्रजनन अंगों के रोगों को दूर करने में विशेष रूप से लाभकारी है। इस आसन से पाचन शक्ति एवं भूख बढती है। चेहरे पर कान्ति आ जाती है एवं मन प्रसन्न रहता है।

सावधानिया-

कमर दर्द वाले व्यक्ति अपनी पीठ एवं गर्दन को सीधा रखें। जिनको यह आसन करने में कठिनाई महसूस हो वे अपने कुल्हों के नीचे 4-र्6 इंच की गद्दी लगाकर कर सकते है। आसन करना सहज होगा।

नौकासन

अर्थ-

इस आसन में षरीर की आकृति नाव (नौका) की तरह होने से ही इसका नाम नौकासन या नावासन रखा गया है।

विधि-

दोनों पैर सामने फैलाकर सीधे बैठ जायें। अपने धड़ को पीछे की ओर झुकाते हुये दोनों कोहनियों के बल अधलेटी स्थिति में आ जायें। सीने को फैलाते हुये ऊंचा उठा दें। कंधा और कोहनी एक सीध में ही रखें। अब दोनों पैरों की एडी व पंजों को मिलाकर रखते हुये दोनों पैरों को धीरे-धीरे सिर के बराबर ऊपर उठा दें। पैरों के पंजों को अपनी ओर खींचकर रखने का प्रयास करें। इस स्थिति में 1 मि. तक रूकें। धीरे धीरे विपरीत क्रम में वापस आजायें। षवासन में लेटकर विश्राम करें।

विशेष-

आसन की स्थिति में आने के पष्चात् सीना चैंडा और सामान्य रखें। गर्दन की स्थिति सामान्य रखें। अवांछित तनाव न आनें दें। जो लोग दोनांे पैरांे को उठाने में परेषानी महसूस करते हों वे एक-एक पैर से भी कर सकते हंै। मगर पैर बदल कर दोनों पैरो से बराबर समय तक अभ्यास करें ।

लाभ-

पेट व कमर की चर्बी को कम व मांसपेषियों को सु़़दृढ करता है। पेट के वायु विकार व गुर्दों की समस्या को ठीक करता है। मधुमेह रागियों के लिये लाभकारी है। उदर के समस्त प्रकार के विकारों को ठीक करता है। कंधों व गर्दन की मांसपेषियाॅ मजबूत होती हैं।

सावधानी-

जिन लोगों को कन्धे या गर्दन में दर्द रहता है वो पीठ के बल लेटकर उत्तनपाद आसन का अभ्यास करें। जिनको उच्चरक्त चाप, हृदय रोग या अंब्लीकल हर्निया की षिकायत हो वो इस आसन का अभ्यास नहीं करें।

भुजंगासन

अर्थ-

भुजंग एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है सर्प। इस आसन में हमारे शरीर की आकृति फन उठाये सर्प की तरह होती है अतः इसे भुजंगासन कहते है।

विधि-

कम्बल/मैट पर पेट के बल लेट जायें। मस्तक जमीन से लगा रहेगा। पैरों के पंजे, एड़ी, टखने व घुटने मिलाकर सीधे रखें, हथेलियों को छाती के आस पास जमीन पर टिकाकर (यथासंभव कंधों की बगल में) क्रमशः ललाट, नाक, ठुड्डी, गर्दन व छाती को उपर की ओर मरोडते हुये जमीन से उठा दें। यहां तक की कमर तक का शरीर उपर उठ जाये। आवश्यकतानुसार हाथों का सहारा ले सकते है। अब आपके शरीर की स्थिति एक फन उठाये सर्प के समान
हो गई है। इस स्थिति में कुल्हों की मांसपेशियों को संकुचित करें, ताकि कमर से दबाब हट जायें। 1/2 से 1 मिनट तक आसन में रूके रहे फिर विपरीत क्रम में वापस लेटने की स्थिति में आकर विश्राम करें।

विशेष निर्देश-

छाती को उपर उठाने के बाद ज्यादा से ज्यादा फुलाकर रखने का प्रयास करें।

लाभ-

  1. कंधों व गर्दन की तकलीफ दूर होकर मजबूत बनते है।
  2. भोजनोपरान्त होने वाले पेट के आफरे में अत्यन्त लाभकारी है।
  3. मेरूदण्ड का उचित व्यायाम होकर उसके दोष दूर होते है।
  4. पेट के अन्दरूनी अवयवों को दुरूस्त व सक्रिय करता है।
  5. दमा, मन्दाग्नि व वायुदोषों में इसका विशेष प्रभाव है।
  6. कमर दर्द के लिये अत्यन्त लाभकारी है।
  7. पाचन शक्ति व भूख को बढाता है।
  8. थायराॅयड, पैराथायराॅयड, एड्रीनल और जननांगों से सम्बन्धित अन्तःस्त्रावी ग्रंथियों में रक्त का प्रवाह सुचारू बनाकर उन्हें निर्दोष करता है।

सावधानी-

जिन लोगों की कमर में दर्द रहता है वे या तो हथेलियों को जमीन पर नहीं टिकायें (अधर रखें) और शरीर को अपनी ही ताकत से (हाथों के सहारे के बिना) ऊंचा उठायें या हाथों को हथेलियों से कोहनी तक जमीन पर टिकाकर रखें एवं शरीर को ऊंचा उठाने में हाथों की शक्ति का इस्तेमाल नहीं करें।

शीर्षासन

अर्थ-

सिर (शीर्ष) के बल खड़े रहने के कारण इस आसन का नाम शीर्षासन है। जिस तरह मुखिया के बगैर घर अधूरा होता है, उसी तरह शीर्षासन के बिना योगाभ्यास अधूरा होता है। इसी लिऐ इसे आसनों का राजा कहा जाता है।

विधि-

पंजों एवं घुटनों के बल बैठ जाइयें। दोनों हाथों की अंगुलियाॅं आपस में फंसाकर, दोनों कोहनियों एवं फंसे हुये पंजों से एक त्रिकोण सा बनाते हुये हाथों को सामने बिछी कम्बल (या दरी) पर रख दें। इस स्थिति में पंजे खड़े रहेंगे (छोटी अंगुलिया फर्श को छूते हुये और अंगुठे उपर की ओर)। आगे की ओर झुककर अपने सिर का मध्य भाग दोनों पंजों (फंसे हुये) के बीच कम्बल (या दरी) पर रख दें। अपने पैरों को कूल्हों से पंजों तक सीधा तान दें। अब अपने पैरों को धीरे-धीरे शरीर के करीब लायें और घड़ (सिर से कुल्हों तक) को जमीन से लम्बवत् (90 डिग्री) हो जाने दें। सिर को हथेलियों के सहारे मजबूती से जमाकर पैरों के पंजों को जमीन से उठाने का प्रयास करें।
अभ्यास करने पर कुछ समय बाद पैर उठने लगेंगे। पैर उठने पर जांधंे व घुटने छाती से लग जायेंगे।  अब सन्तुलन साधते हुये कुल्हों से घुटनों तक के पैरों को उपर की ओर सीधा कर दें। घुटने मुडे हुये ही रहेंगे। सिर से घुटनों तक सीधा हो जाने के बाद घुटनों को सीधा करते हुये पैरों को उपर तान दें। इस प्रकार आपका पुरा शरीर सिर के बल जमीन से लम्बवत् (90 डिग्री) की स्थिति में आ जायेंगा। यह पूर्णत्व की स्थिति है।

इस स्थिति में अपनी क्षमतानुसार 5 से 10 मिनट तक रूककर पहले घुटनों को मोडें़ फिर कुल्हों से मोडते हुये पैरों को पेट की तरफ लायें। पैरों को जमीन पर टिकाकर सीधा करने के बाद घुटनों को जमीन पर टिका दें। सिर को हल्का सा उठाकर, ललाट को पंजों पर रख, कुछ पल विश्राम करें। अब सीधे होकर बैठ जायें। शवासन में लेटकर 1-2 मिनट विश्राम करें।

1. कम्बल पर त्रिकोणी स्थिति में रखे हाथों की स्थिति में कोहनियों के बीच की दूरी कंधे के चैडाई के बराबर रखे अर्थात् कंधा और कोहनी एक लाईन में होने चाहिये। साथ ही कंधों को ज्यादा से ज्यादा ऊंचा उठाने का प्रयास करें।

विशेष निर्देश-

  1. शुरूआत में (नये साधक) इस आसन का अभ्यास दीवार का सहारा लेकर करना सुरक्षित रहता है। दीवार का सहारा लेने से गिरने व चोट लगने से बचाव रहता है। दो दीवारों के कोने में अभ्यास करना अधिकतम सुरक्षित है।
  2. अभ्यास करते समय दोहरा तिहरा करके कम्बल या दरी बिछाकर हाथों व सिर को उसी पर टिकायें। तकिये का इस्तेमाल नहीं करें। जरूरी है कि सिर के नीचे का टिकाव स्थिर व हल्का मुलायम रहे। बिना सहारे के (दरी/कम्बल) करने पर सिर, गर्दन, पीठ आदि में दर्द हो सकता है व सिर में चोट की संभावना रहती है। अतः दरी, कम्बल या मोटा तौलिया आदि का इस्तेमाल अवश्य करें।
  3. शीर्षासन करते समय सिर का वह भाग (मध्य भाग) जमीन पर रखें जहां से रीढ को सीधा रखा जा सकें।
  4. पैरों को झटके से उपर नहीं उठायें। नियमित अभ्यास से यह आसानी से उपर उठने लगेंगे।
  5. गर्दन में किसी प्रकार की तकलीफ वाले लोग एवं शीर्षासन करने पर जिनके गर्दन पर दबाब आता है ऐसे लोग
    शीर्षासन का अभ्यास नहीं करें।

लाभ-

जिस प्रकार से राजा के कर्तव्य और अधिकार असीमित होते है वैसे ही शीर्षासन के लाभ असीमित है फिर भी जानकारी हेतु कुछ विशेष लाभ बता रहे है।

  1. मस्तिष्क में रक्त संचार की वृद्धि, मस्तिष्क संबंधी रोग, स्मरण शक्ति का विकास, बालों का पकना, झडना, साईनस आदि।
  2. स्नायु केन्द्रों को दृढ बनाता है एवं सभी अन्तः स्त्रावी ग्रन्थियों को स्वस्थ कर हारमोनल डिस आर्डर को ठीक करता है।
  3. पाचन तन्त्र, रक्त विकार, मासिक धर्म विकार, जननेन्द्रियों से सम्बन्धित समस्त रोग, मधुमेह आदि में अत्यन्त लाभकारी है।

सावधानी-

  1. ऐसे व्यक्ति जिन्हें उच्च रक्तचाप, अस्थमा, आंॅख दर्द, कान में दर्द, सर्वाइकल/मिर्गी रोग या हृदय रोग हो वे इस आसन को कदापि नहीं करें।
  2. शीर्षासन में पुर्णत्व की स्थिति तक आने एवं पुर्णत्व से वापस लौटने की समस्त क्रिया एकदम धीरे-धीरे (इंच- इंच कर) पूरी सजगता से अपने शरीर व मन को देखते हुये करें।
  3. शीर्षासन करने के तुरन्त बाद शवासन अवश्य करें अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि हो सकती है।